क्या कांग्रेस में अकेले ही जूझने को मजबूर हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया

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क्या कांग्रेस में अकेले ही जूझने को मजबूर हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया

अरुण पटेल/सुबह सबेरे में प्रकाशित आलेख

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने हुए 14 माह से अधिक का समय हो गया है लेकिन प्रदेश कांग्रेस कमेटी में चल रही गुटबाजी के कारण प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का फैसला नहीं हो पा रहा है। कमलनाथ मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की दोहरी भूमिका में हैं। काफी समय पूर्व वे स्वयं ही अध्यक्ष का पद छोड़ने की पेशकश कर चुके हैं। इधर ऐसा लगने लगा है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं कांग्रेस के महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद की लड़ाई खुद की पार्टी में लड़ने को मजबूर हो रहे हैं? जिन चेहरों को उन्होंने कमलनाथ सरकार में मंत्री बनवाया है उनमें से कई ऐसे हैं जो अपनी अटपटी कार्यशैली या बयानों के कारण अपने नेता को मजबूत करने की जगह कभी-कभी ऐसे हालात पैदा कर देते हैं जो भले ही सिंधिया न कहें, लेकिन लगता है उन्हें असहज परिस्थितियों में डाल देते हैं। कभी-कभी ऐसा भी आभास होता है कि कमलनाथ सरकार के अनेक मंत्री एक सुगठित टीम के स्थान पर अपनी ढपली, अपना राग अलापने लगते हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ अवश्य पूरी तेजी से कांग्रेस का जनाधार बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं और वे दलितों-आदिवासियों का मन मोह लेने का कोई अवसर नहीं जाने दे रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर तेजी से औद्योगीकरण की दिशा में भी आगे बढ़ रहे हैं। प्रदेश प्रभारी महासचिव दीपक बाबरिया को गुटों व धड़ों में बंटी कांग्रेस में समन्वय स्थापित करने के लिए हाईकमान ने उनकी अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की है। देखने वाली बात यही होगी कि बाबरिया मंत्रियों व अलग-अलग दिशाओं में अपनी महत्वाकांक्षाओं के घोड़े दौड़ाने के अभ्यस्त रहे कांग्रेसजनों के बीच कितना समन्वय स्थापित कर पाते हैं? अभी तक तो यह देखने में आया है कि मंत्रिमंडल के सदस्यों को बाबरिया की दी गई सीख और साफ नसीहत का उन पर कोई खास प्रभाव नहीं हुआ है।
प्रदेश की राजनीतिक बीथिकाओं में इस बात का इंतजार किया जा रहा है कि सिंधिया की पार्टी के अन्दर क्या भूमिका होगी और उसके बाद ही प्रदेश में कांगे्रस की राजनीतिक दिशा व दशा स्पष्ट हो सकेगी। वैसे सिंधिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद के एक सशक्त दावेदार के रुप में उभरे हैं क्योंकि भाजपा की डेढ़ दशक पुरानी सत्ता को उखाड़ने के लिए कांग्रेस ने जो दो चेहरे आगे किए थे उनमें कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया थे, जबकि पर्दे के पीछे प्रदेश में जमावट करने एवं गुटों व धड़ों में बंटे कांग्रेसजनों को एकजुट करने के सूत्र दिग्विजय सिंह के पास थे और इसमें उन्होंने पूरे प्रदेश का दौरा किया, जिससे कांग्रेसजनों में उत्साह का संचार हुआ और सबने एकजुट होकर अंतत: सरकार बनाने में सफलता हासिल कर ली। कमलनाथ की ताजपोशी मुख्यमंत्री के रुप में हो चुकी है और अब कांग्रेस हाईकमान को सिंधिया और दिग्विजय सिंह की भूमिकाओं के बारे में अपने पत्ते खोलना शेष है जो राज्यसभा चुनाव में प्रत्याशियों के चयन से अधिक साफ होगी। लेकिन जहां तक राज्यसभा की उम्मीदवारी का सवाल है दोनों में से किसी की भी उपयोगिता को कांग्रेस की राजनीति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जहां तक प्रदेश अध्यक्ष का सवाल है सिंधिया समर्थक कुछ मंत्री समय-समय पर उन्हें प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंपे जाने की मांग करते रहते हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी तो कई मर्तबा इस तरह की मांग कर चुकी हैं। अन्य मंत्री जिनमें तुलसी सिलावट, गोविन्दसिंह राजपूत, प्रद्युम्न सिंह तोमर भी उन्हें अध्यक्ष पद सौंपने की मांग करते रहे हैं।
जहां तक समर्थकों की बयानबाजी का सवाल है उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि केवल उनकी मांग से सिंधिया प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनेंगे, लेकिन लगता है वे अपने नेता की नजर में चढ़ने के लिए समय-समय पर ऐसी मांग करते रहते हैं। जहां तक सिंधिया की भावी भूमिका का सवाल है वह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, महासचिव प्रियंका गांधी मिलकर करेंगी और उन पर किसी प्रकार की लॉबिंग का कोई असर नहीं पड़ेगा। सिंधिया खुद गांधी परिवार के करीबी माने जाते हैं। प्रद्युम्न सिंह तोमर सरकार के काबीना मंत्री हैं लेकिन वे अक्सर ऐसा कर देते हैं जिससे सिंधिया स्वयं असहज हो जाते हैं और वे अपनी असहमति तक व्यक्त कर चुके हैं। सार्वजनिक तौर पर सिंधिया के समक्ष शाष्टांग की मुद्रा में रहते हैं। एक-दो बार सिंधिया उन्हें ऐसा करने से मना कर चुके हैं। ताजा उदाहरण इस बात का है कि उन्होंने ग्वालियर में नगर निगम के एक इंजीनियर के पैर पकड़ लिए। ग्वालियर में भूमिपूजन के चार माह बाद भी उनके निर्वाचन क्षेत्र में सीवेज लाइन बिछाने का काम आरम्भ न होने के कारण सीवेज लाइन के लिए उन्हें न केवल अधिकारियों की बैठक बुलाना पड़ी बल्कि नगर निगम इंजीनियर शिशिर श्रीवास्तव के पैर पकड़ लिए और बोले कि इस काम को जैसे भी हो पूरा कराओ, क्यों मेरी फजीहत करा रहे हो। उनके इस व्यवहार पर चुटकी लेने से मध्यप्रदेश खनिज निगम के पूर्व उपाध्यक्ष और भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी रहे गोविंद मालू नहीं चूके और उन्होंने इस पर गहरा तंज कस दिया। ट्वीट करते हुए उन्होंने कहा कि- जो बात घर में हुई थी वह अब बाजार में है, कोई सूराख तो यकीनन मेरी दीवार में है। तबादले की कीमत आपने वसूल कर ली, तो हमने कुर्सी खरीद ली, अब पॉव पड़ो या हाथ जोड़ो, हमने लीज पर ली है यह सल्तनत, जहां हुक्म हमारा चलेगा, आपको तो पॉव ही पड़ना पड़ेंगे।
जहां तक सिंधिया की राजनीति और उसमें उनकी भूमिका की तलाश का सवाल है उनके समर्थक कांग्रेस प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि सिंधियाजी एक ऐसे राजनेता हैं जो कांग्रेस पार्टी के लिए अखिल भारतीय स्तर पर बहुत श्रम करते हैं और बदले में उनको क्या राजनीतिक कद व पद मिलता है इसकी परवाह नही करते। उनका मूल उद्देश्य कांगे्रस के मंच से जनता जनार्दन की सेवा करना तथा देश व प्रदेश का विकास है और ऐसे राजनेता किसी भी राजनीतिक दल के लिए पूंजी होते हैं। सिंधिया प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के अंदर स्वयं की लड़ाई अकेले लड़ते नजर आ रहे हैं और उनके समर्थन से जो लोग मंत्री बने हैं उनमें से एक-दो को छोड़कर अधिकांश न तो प्रशासन पर और न ही प्रादेशिक राजनीतिक फलक पर अपनी कोई छाप छोड़ पाये हैं, न ही उन्होंने समूचे प्रदेश में दौरा कर अपना स्वयं का प्रभाव छोड़ने की कोशिश की है। तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत को छोड़ दिया जाए तो कोई अन्य समर्थक ऐसा कुछ विशेष करता नजर नहीं आ रहा जिससे सिंधिया को अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने में मदद मिले।
और यह भी
कमलनाथ ने आदिवासी बाहुल्य डिंडौरी जिले में माता शबरी जयंती के अवसर पर कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास का नया इतिहास आदिवासी समाज के साथ मिलकर लिखा जायेगा और आदिवासी क्षेत्रों से पलायन को रोकने, रोजगार देने एवं स्थानीय उपज का बाजिव दाम दिलाने के लिए सुनिश्‍चित योजनायें बनाई जायेंगी। आदिवासी इलाकों के विकास के लिए जो योजनायें बनी थी और वर्षों से धूल खा रही थीं उन्हें लागू कर इसका लाभ पहुंचाया जायेगा। उनकी सरकार का लक्ष्य है कि आदिवासी समाज का सर्वांगीण विकास हो। प्रदेश में औद्योगीकरण का माहौल बनाने के साथ ही कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश को फार्मास्युटिकल हब बनाया जायेगा। उन्होंने औद्योगिक संस्थानों का आव्हान किया कि वे राज्य में आयें, रिसर्च करें और फार्मास्युटिकल औद्योगिक इकाइयों की स्थापना करें। यह बात उन्होंने इंदौर में पीथमपुर औद्योगिक संगठन के प्रतिनिधियों के साथ आयोजित बैठक को सम्बोधित करते हुए कही। इन दिनों युवाओं को रोजगार, किसानों की कर्जमाफी करने के साथ ही वे सारे प्रयास उनके एजेंडे में अव्वल हैं जिससे प्रदेश में विकास की नई गाथा लिखी जायेगी। कमलनाथ का साफ कहना है कि मप्र की पहचान माफिया से नहीं हो सकती,इसलिए हमने माफिया के खिलाफ अभियान शुरू किया है जो चलता रहेगा। कमलनाथ को कोई दबा नहीं सकता और पटा नहीं सकता।

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