बट बृक्ष एवं यम देवता की पूजा कर सुहागिनों ने पति की लम्बी उम्र की कामना

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पति की दीर्घायु के लिए सुहागिनों ने रखा बट साबित्री वृत

बट बृक्ष एवं यम देवता की पूजा कर सुहागिनों ने पति की लम्बी उम्र की कामना

रमेश श्रीवास्तव

ललितपुर/ कस्वा एवं ग्रामीण क्षेत्रों में वट सावित्री अमावस्या का वृत सुहागिन महिलाओं द्वारा श्रृद्धा एवं उत्साह पूर्वक मनाया गया इस अवसर पर सुहागिनों द्वारा वट वृक्ष की पूजा करके पति की लम्बी आयु की कामना की गई । अन्य वर्षों की अपेक्षा इस बार महिलाएं समूह में
पूजा करती हुई ज्यादा दिखाई नहीं दी । पूजा केदौरान सोसल डिस्टैनसिंग का ध्यान रखा गया ।
ज्येष्ठ मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या को बट सावित्री वृत अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है । इस दिन को सुहागिन महिलाएं बट सावित्री अमावस्या वृत के रुप में मनाती है, साथ ही लम्बी उम्र का प्रतीक एवं देव स्वरूप माने जाने वाले वट वृक्ष की पूजा करके अपना वृत पूर्ण करती है। कृष्ण पक्ष की अमावस्या के दिन वट सावित्री वृत को मनाने के लिए सुहागिन महिलाओं दिन में काफी धूप होने एवं गर्मी से वचने के लिए सुबह से ही तैयारियां सुरु कर दी थी महिलाओं द्वारा सोलह श्रृंगार करके पूजा का थाल सजाकर सामूहिक रुप से  वट वृक्ष (बरगद) के पेड के पास पूजा करने पँहुची वहां पर वट वृक्ष को जल अर्पित कर हल्दी से रंगा हुआ सूत का पीला धागा बांध कर सुहाग की सामग्री चढाई गयी । अपनी श्रृद्धा एवं सामर्थ के अनुसार महिलाओं ने 05- 11- 21- 51- एवं 108 बार बरगद के पेड पर धागा बांधकर लंबी आयु का बर मांगा साथ ही बरगद के पेड के नीचे बैठकर आस्था के साथ सावित्री वृत की भी कथा सुनी । मान्यता के अनुसार वट वृक्ष को देव स्वरुप एवं लम्बी आयु का प्रतीक माना जाता है। वट वृक्ष में वृह्मा विष्णु और महेश का वास माना जाता है । यैसी मान्यता है की जो सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूजन करती है और साबित्री वृत की कथा सुनती है उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है । भारतीय संस्कृति में वट वृक्ष को लम्वी उम्र का प्रतीक एवं देव तुल्य माना जाता है  परंपरा के अनुसार इस दिन महिलाएं पति की दीर्घायु एवं सौभाग्य प्राप्त करने के लिए इस वृत को रखती है । कथा में यह प्रसंग है की पुरातन काल में एक अश्वपति नाम के राजा हुए उनकी कोई संतान नहीं थी राजा ने संतान प्राप्ति के लिए अनेकों यज्ञ एवं धार्मिक अनुष्ठान किए तपोवल के कारण राजा को एक तेजस्वी कन्या की प्राप्ति हुई ।उस कन्या का नाम राजा ने सावित्री रखा जब सावित्री विवाह योग्य हो गाई लिए वर की तलास होने लगी तो सावित्री के पिता ने सावित्री से अपने योग्य वर तलाशने की बात कही तो वह अगले दिन योग्य वर की तलाश में घर से निकल पडी और उन्होंने अपने माता पिता के साथ तपोवन में रह रहे सत्यवान को वर के रुप में चुन लिया । घर लौटने पर उन्होंने वर चुनाव की बातअपने पिता और देवश्री नारद को सुनाई तो नारद जी ने सत्यवान को अल्पायु बताते हुए अपना फैसला बदलने का सुझाव दिया लेकिन सावित्री ने अपना फैसला नहीं बदला और सत्यवान से अपना विवाह रचाया। एक दिन जंगल में लकडी काटते समय सत्यवान की मृत्यु हो गई थी साबित्री ने सत्यवान को मृत अवस्था में बरगद के पेड के नीचे छोडकर यमराज के पीछे चल दी और उन्होंने सच्चा प्रेम निष्ठा अपने पति वृत धर्म के बल पर सत्यवान के प्राण बापस करने के लिए यमराज को भी विवस कर दिया था । । तभी से लेकर आज तक महिलाएं साबित्री को सति के रुप मानती एवं पूजती चली आरही है ।

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